वक्फ संशोधन बिल क्या है? क्यों है इतना हंगामा? वक्फ संशोधन कानून एक्सप्लेनर; जानिए A To Z
ब्यूरो: Waqf Amendment Bill: देश में कुछ चर्चित मुद्दों ने वक्फ संपत्तियों से जुड़ी विसंगतियों को जगजाहिर कर दीं। थिरूचेंथुरई गांव को ही वक्फ बोर्ड ने अपनी संपत्ति बता दिया जिससे वहां के किसान अपनी ही जमीन को बेच पाने में असमर्थ हो गए। सूरत नगर निगम की बिल्डिंग पर ही वक्फ ने अपना हक जता दिया तो धर्मनगरी भेंट द्वारका के दो द्वीपों को वक्फ संपत्ति बता डाला, जिसे लेकर अदालत ने भी हैरानी जताई। सूरत की शिव शक्ति सोसाइटी में वक्फ संपत्ति विवाद के चलते स्थानीय स्तर पर माहौल गरमाया, सामुदायिक तनाव के हालात उपजे। देश भर में वक्फ से जुड़े कई मामलों में कानून व्यवस्था की कड़ी चुनौतियां उभरीं। तभी केंद्र सरकार को अहसास हो गया था कि जल्द कदम न उठाए गए तो भविष्य में जटिल परिस्थितियों को सामना करना पड़ सकता है। लोकसभा से पारित वक्फ संशोधन विधेयक अब राज्यसभा से पारित होने के बाद कानून बनने की संवैधानिक प्रक्रिया से गुजर रहा है।
भारत में वक्फ संपत्तियों का बड़ा हिस्सा अतिक्रमण व कुप्रंबधन का शिकार रहा
पूरे देश में वर्ष में वक्फ की अचल संपत्तियों में से तीन लाख 39 हजार 505 संपत्तियां ही अतिक्रमण से बची हुई हैं। जबकि 13 हजार 202 संपत्तियों को लेकर मामला अदालत में विचाराधीन है। कुल 58 हजार 896 संपत्तियां अतिक्रमित कर ली गई हैं। चार लाख 36 हजार 169 संपत्तियों के बारे में वक्फ बोर्डों के पास भी कोई सूचना नहीं है तो 24 हजार 550 अन्य की श्रेणी में हैं। भारतीय वक्फ परिसंपत्ति प्रबंधन प्रणाली (वामसी) के अनुसार, देश में कुल कुल 3,56,047 वक्फ संपदा हैं। इनमें अचल संपत्तियों की कुल संख्या 8,72,324 और चल संपत्तियों की कुल संख्या 16,713 है। डिजिटल रिकॉर्ड की संख्या 3,29,995 है। मुस्लिमों व गैर मुस्लिमों की ओर से केंद्र सरकार से वक्फ भूमि पर अतिक्रमण और वक्फ संपत्तियों के कुप्रबंधन सरीखी शिकायतें की गईं। अप्रैल, 2023 से प्राप्त 148 शिकायतों में ज्यादातर अतिक्रमण, वक्फ भूमि की अवैध बिक्री, सर्वेक्षण और पंजीकरण में देरी और वक्फ बोर्डों और मुतवल्लियों के खिलाफ शिकायतों से संबंधित थीं।
वक्फ संपत्तियों से संबंधित शिकायतें व ट्रिब्यूनल्स के पेंडिंग केसों के आंकड़े चौंकाने वाले रहे
केंद्रीय अल्पसंख्यक मंत्रालय ने अप्रैल, 2022 से मार्च, 2023 तक केंद्रीकृत लोक शिकायत निवारण और निगरानी प्रणाली पर प्राप्त शिकायतों को संकलित किया। इसमें मिलीं 566 शिकायतों में से 194 शिकायतें वक्फ भूमि पर अतिक्रमण और अवैध रूप से हस्तांतरण से संबंधित थीं और 93 शिकायतें वक्फ बोर्ड/मुतवल्लियों के अधिकारियों के खिलाफ थीं। अधिकतर शिकायतें वक्फ संपत्तियों के पंजीकरण में देरी, वक्फ बोर्ड द्वारा बाजार मूल्य से कम किराया लेने, वक्फ भूमि पर बड़े पैमाने पर अतिक्रमण, विधवाओं के उत्तराधिकार अधिकार, सर्वेक्षण आयुक्त द्वारा सर्वेक्षण पूरा न करने से संबंधित थीं।
केंद्रीय न्याय मंत्रालय ने वक्फ ट्रिब्यूनलों की समीक्षा की तो पता चला कि इनके सामने 40,951 मामले लंबित हैं, जिनमें से 9942 मामले मुस्लिम समुदाय द्वारा वक्फ का प्रबंधन करने वाली संस्थाओं के खिलाफ दायर किए गए हैं।
नए संशोधित कानून की जरूरत क्यों आन पड़ी
केंद्र सरकार ने वक्फ संपत्तियों से जुड़े स्टेकहोल्डर्स से व्यापक विमर्श किया है। जिसके बाद जो बिंदु उभरे उनमें अहम थे। सीडब्ल्यूसी (केंद्रीय वक्फ परिषद) और एसडब्ल्यूबी (राज्य वक्फ बोर्ड) की संरचना का आधार बढ़ाना, मुतवल्लियों की भूमिका और जिम्मेदारियां, ट्रिब्यूनल का पुनर्गठन, रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया में सुधार, टाइटल्स की घोषणा, वक्फ संपत्तियों का सर्वेक्षण, वक्फ संपत्तियों का म्यूटेशन, मुतवल्लियों द्वारा खातों फाइलिंग, वार्षिक खाता फाइलिंग में सुधार, निष्क्रांत संपत्तियों/परिसीमा अधिनियम से संबंधित प्रावधानों की समीक्षा, वक्फ संपत्तियों का वैज्ञानिक प्रबंधन। निम्नवत बिंदुओं से नया संशोधन करना अपरिहार्य हो गया। मसलन,
--साल 1995 का वक्फ अधिनियम और साल 2013 का संशोधन प्रभावकारी नहीं रहे गए हैं।
-- वक्फ भूमि पर अवैध कब्जा, कुप्रबंधन और मालिकाना हक का विवाद, प्रॉपर्टी रजिस्ट्रेशन और सर्वेक्षण में देरी, बड़े पैमाने पर मुकदमे सरीखी दिक्कतें कई गुना बढ़ती जा रही हैं।
---वक्फ ट्रिब्यूनल्स के फैसलों को हाईकोर्ट में चुनौती नहीं दी जा सकती है। ये नियम पारदर्शिता व जवाबदेही घटता है जो लोकतंत्र में उचित नहीं कहा जा सकता है।
--वक्फ अधिनियम की धारा 40 का बेजा इस्तेमाल करके कई निजी संपत्तियों को वक्फ संपत्ति घोषित किया गया है।
--कुछ राज्यों मे वक्फ बोर्डों ने अपनी शक्तियों का दुरुपयोग किया है जिससे सामुदायिक तनाव पनपा है।
--‘एक बार वक्फ, हमेशा वक्फ’ के सिद्धांत ने कई विवादों को जन्म दे दिया।
पिछले साल वक्फ संशोधन बिल का विरोध हुआ तो मामला जेपीसी को सौंप दिया गया
बीते साल 8 अगस्त को अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू ने लोकसभा में वक्फ (संशोधन) विधेयक, 2024 और मुसलमान वक्फ (निरसन) विधेयक, 2024 पेश किया। तब उन्होंने कहा था कि वक्फ संशोधन विधेयक सच्चर कमेटी की सिफारिशों के आधार पर ही लाया गया है। नए संशोधन की जरूरत के लिए ये दलीलें दी गईं। पर इस बिल लेकर विपक्षी दलों ने जबरदस्त हंगामा किया जिसके चलते इस विधेयक को संयुक्त संसदीय समिति यानी जेपीसी के पास भेजा गया। जेपीसी में लोकसभा के 21 और राज्यसभा के 10 सांसद शामिल थे। पहली बैठक 22 अगस्त, 2024 को की गई। समिति ने कुल तीन दर्जन बैठके कीं। समिति ने आम जनता, विषय विशेषज्ञों/हितधारकों व अन्य संबंधित संगठनों से रायशुमारी की। 27 जनवरी 2025 को जेपीसी ने बिल के ड्राफ्ट को मंजूरी देकर सुझाए गए 14 संशोधनों को स्वीकार कर लिया। इसके बाद 13 फरवरी 2025 को जेपीसी की रिपोर्ट संसद में पेश की गई। 19 फरवरी 2025 को कैबिनेट की बैठक में वक्फ के संशोधित बिल को मंजूरी मिल गई। 2 अप्रैल को यह बिल संसद में पेश कर दिया गया। जिस पर बहस हुई और वोटिंग हुई।
बिल लोकसभा में बहुमत से पारित अब राज्यसभा में पेश हुआ
संसद में वक्फ बिल को पास कराने के लिए बहुमत पाने के लिए मोदी सरकार ने अपने खेमे के सहयोगियों का साथ भी हासिल किया। लोकसभा के 543 में से 272 सदस्यों के समर्थन की दरकार थी। लोकसभा में बीजेपी के 240 सांसद हैं एनडीए के सहयोगी घटक टीडीपी के 16, जेडीयू के 12, शिवसेना (शिंदे) के 7 और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के 5 सांसद हैं। इनके अलावा एनडीए के पास राष्ट्रीय लोकदल के दो, जेडीएस के दो और अपना दल (सोनेलाल) से एक सांसद है। बुधवार को लोकसभा में दोपहर बारह बजे से शुरू हुई बहस बारह घंटे से अधिक वक्त तक जारी रही। कांग्रेस-सपा सहित विपक्षी दलों ने इस विधेयक को मुस्लिमों के धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप करार देते हुए नाराजगी जताई। रात एक बजे के करीब वोटिंग प्रक्रिया शुरू हुई। विधेयक के पक्ष में 288 और विपक्ष में 232 वोट पड़े। इसके साथ ही लोकसभा में वक्फ संशोधन विधेयक-2025 पारित हो गया। अब इसे राज्यसभा में पेश किया गया है। यहां 9 सीटें रिक्त हैं। ऐसे में मौजूदा 236 में से 119 सांसदों का समर्थन विधेयक के पक्ष में चाहिए। बीजेपी के पास 96 सांसद हैं। वहीं एनडीए की सहयोगी पार्टियों के पास 19 सांसद हैं। ऐसे में सरकार को 6 नॉमिनेट सांसदों के समर्थन की भी दरकार है।
वक्फ संशोधन कानून बनने से होने वाले से सकारात्मक परिणाम
अल्पसंख्यक मामलों के केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू ने लोकसभा में पेश वक्फ संशोधन बिल-2024 को UMEED यानी यूनीफाइड वक्फ मैनेजमेंट इम्पावरमेंट, इफिशिएंसी ऐंड डेवलपमेंट नाम दिया। इस कानून के जरिए दूरगामी परिवर्तन के दावे किए गए हैं। नए संशोधन बिल से सकारात्मक नतीजे हासिल करने की आस जताई जा रही है।
---इस संशोधन बिल के कानून बनने के बाद वक्फ से जुड़ी संपत्तियों का बेहतर प्रबंधन सुनिश्चित होगा।
---केंद्रीय और राज्य वक्फ बोर्ड में मुस्लिम महिलाओं का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित होगा
---किसी भी धर्म के लोग इसकी कमेटियों के सदस्य हो सकते हैं। इससे एकपक्षीय मामला होने पर रोक लग सकेगी। सबकी सुनवाई हो सकेगी।
--इस बिल का कोई भी प्रावधान संविधान के किसी भी अनुच्छेद का उल्लंघन नहीं करता है।
--यह बिल किसी का हक छीनता नहीं है। बल्कि उन्हें हक देता है जिन्हें आज तक उनका हक नहीं मिला।
-- प्रस्तावित कानून का असर पुरानी मस्जिदों, दरगाहों या मुसलमानों के धार्मिक संस्थानों पर नहीं पड़ेगा।
---विधेयक के कानून बन जाने के बाद वक्फ संपत्ति विवाद सुलझाने में राज्य सरकारों को पहले से अधिक शक्तियां हासिल होंगी।
नए कानून से वक्फ प्रशासन अधिक पारदर्शी, कुशल और जवाबदेह बनेगा
केंद्र सरकार की दलील है कि संशोधन विधेयक का मकसद देश भर में वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन सुधार करना, पिछले कानून की कमजोरियों को दूर करना और वक्फ बोर्डों की कार्यकुशलता बेहतर करना है। इससे वक्फ संपत्तियों के रेगुलेशन और प्रबंधन में आ रही दिक्कतों व चुनौतियों का हल संभव हो सकेगा। रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया में सुधार हो सकेगा, वक्फ रिकॉर्ड के रखरखाव में तकनीक का उपयोग हो सकेगा। माना जा रहा है कि एनडीए के सहयोगी दलों टीडीपी और जेडीयू के सुझावों के साथ ही जेपीसी में हुए विचार विमर्श से निकले सुझावों के चलते वक्फ संशोधन विधेयक में कई अहम परिवर्तन किए गए। लेकिन सरकार ने अपने मूल विचारों को शामिल करने में कोई समझौता नहीं किया है।
1—संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) द्वारा विभिन्न मंत्रालयों/विभागों के प्रतिनिधियों के विचार/सुझाव सुने गए
- अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय, विधि एवं न्याय, रेलवे (रेलवे बोर्ड), आवास और शहरी मामलों, सड़क परिवहन और राजमार्ग, संस्कृति (भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण), राज्य सरकारें, राज्य वक्फ बोर्ड संग बैठकें हुईं।
2--जेपीसी ने इन संस्थाओं व संगठनों से भी विचार विमर्श किया
- ऑल इंडिया सुन्नी जमीयतुल उलेमा, मुंबई
- इंडियन मुस्लिम्ज़ ऑफ सिविल राइट्स नई दिल्ली
- मुत्ताहिदा मजलिस-ए-उलेमा
- जेएंडके (मीरवाइज उमर फारूक)
- जकात फाउंडेशन ऑफ इंडिया
- अंजुमन ए शीतली दाऊदी बोहरा समुदाय
- चाणक्य नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी पटना
- ऑल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज, दिल्ली,
- ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, दिल्ली
- ऑल इंडिया सूफी सज्जादानशीन काउंसिल, अजमेर
- मुस्लिम राष्ट्रीय मंच, दिल्ली
- मुस्लिम महिला बौद्धिक समूह- डॉ. शालिनी अली, राष्ट्रीय संयोजक
- जमीयत उलमा-ए-हिंद, दिल्ली
- शिया मुस्लिम धर्मगुरु
- दारुल उलूम देवबंद
3—इन अहम मामलों को लेकर वक्फ विवाद ने तूल पकड़ा
- थिरुचेंथुरई गांव का विवाद: तमिलनाडु के इस गांव के किसान राजगोपाल ने कर्ज चुकाने के लिए अपनी कृषि भूमि बेचनी चाही पर ऐसा हो नहीं सका। दरअसल, वक्फ बोर्ड ने उनके पूरे गांव थिरुचेंथुरई को वक्फ संपत्ति करार दे दिया। दावा किया गया कि 1956 में नवाब अनवरदीन खान ने गांव को वक्फ के रूप में दान किया था। इससे क्षेत्र में सांप्रदायिक तनाव फैल गया।
- बेंगलुरु ईदगाह मैदान केस: राज्य सरकार के अनुसार किसी भी मुस्लिम संगठन को इस मैदान की कोई टाइटल डीड नहीं मिली है। पर वक्फ ने दावा कर दिया कि चूंकि 1850 से यह वक्फ संपत्ति थी लिहाजा सदा के लिए एक वक्फ संपत्ति हो गई है।
- सूरत नगर निगम केस: गुजरात वक्फ बोर्ड ने सूरत नगर निगम की इमारत को वक्फ की संपत्ति बता दिया। दलील दी कि मुगल काल के दौरान सूरत नगर निगम की इमारत एक सराय थी और हज यात्रा के दौरान इसका इस्तेमाल किया जाता था। ब्रिटिश शासन के दौरान यह संपत्ति ब्रिटिश साम्राज्य की थी। हालांकि, 1947 में जब भारत को आजादी मिली, तो संपत्तियां भारत सरकार को हस्तांतरित कर दी गईं। हालांकि, चूंकि दस्तावेज अपडेट नहीं किए गए थे, इसलिए एसएमसी की इमारत वक्फ की संपत्ति बन गई।
- भेंट द्वारका के द्वीप का केस: वक्फ बोर्ड ने गुजरात हाईकोर्ट में एक याचिका दाखिल कर देवभूमि द्वारका में दो द्वीपों के स्वामित्व पर दावा ठोक दिया। हाई कोर्ट की बेंच ने इस पर हैरानी जताते हुए इस आवेदन पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया और बोर्ड से अपनी याचिका को संशोधित करने के लिए कहा। कोर्ट की टिप्पणी थी कि आखिर वक्फ कृष्णनगरी में जमीन पर दावा कैसे कर सकता है।
- शिव शक्ति सोसाइटी केस: सूरत की शिव शक्ति सोसाइटी में एक प्लॉट मालिक ने अपने प्लॉट को गुजरात वक्फ बोर्ड को सौंप दिया। इसके बाद लोग वहां नमाज पढ़ने लगे। इस मामले से संदेश निकला कि किसी भी हाउसिंग सोसाइटी में एक अपार्टमेंट किसी भी दिन सोसाइटी के अन्य सदस्यों की सहमति के बिना मस्जिद में बदल सकता है, अगर उस अपार्टमेंट का मालिक उसे वक्फ के रूप में दान करने का फैसला करता है।