संवाद और विमर्श ही लोकतंत्र की सर्वोच्च परंपरा: लोकसभा स्पीकर ओम बिरला

By  Atul Verma January 19th 2026 08:55 PM -- Updated: January 19th 2026 08:57 PM

लखनऊ, 19 जनवरी। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने 86वें अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारी सम्मेलन के उद्घाटन सत्र को संबोधित किया है। कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल भी मौजूद रहीं, उन्हीं के भाषण के साथ सम्मेलन का आगाज हुआ। वहीं, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने अपने संबोधन में कहा कि उत्तर प्रदेश स्वतंत्रता संग्राम से लेकर देश की राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना की भूमि रहा है।

विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है भारत- ओम बिरला

अपने संबोधन में लोकसभा अध्यक्ष ने कहा कि विधायिका जनता की समस्याओं के समाधान और उनकी आकांक्षाओं की पूर्ति का सशक्त एवं प्रभावी मंच है। विधायिका के माध्यम से ही जनता की आवाज़ शासन तक पहुँचती है और जनहित के विषयों का समाधान निकलता है। उन्होंने कहा कि भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और संवाद व विमर्श के माध्यम से हमने सिद्ध किया है कि संसदीय लोकतंत्र लोकतंत्र की सर्वोत्तम परंपरा है।

विकसित भारत के संकल्प के साथ निरंतर आगे बढ़ रहा देश- स्पीकर

विकसित भारत के संकल्प के साथ देश निरंतर आगे बढ़ रहा है और वर्ष 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सभी लोकतांत्रिक संस्थाओं की सशक्त भूमिका जरूरी है। सहमति और असहमति लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति हैं; विभिन्न मतों और विचारों से ही लोकतांत्रिक मूल्यों को सुदृढ़ किया जा सकता है।

संसदीय संस्थाओं में जनता का विश्वास बढ़ाना है सभी की जिम्मेदारी- स्पीकर

लोकसभा स्पीकर ने कहा कि संसदीय संस्थाओं में जनता का विश्वास बढ़ाना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है और इसके लिए हमारी कार्यसंस्कृति लोकतांत्रिक मूल्यों पर आधारित होनी चाहिए। देशहित के विषयों पर संसद और राज्यों की विधायिकाएँ समान दृष्टि और भावना से कार्य करती हैं। राज्य विधानसभाओं की कार्यवाही के लिए एक निश्चित एवं पर्याप्त समय सुनिश्चित किया जाना आवश्यक है। सदन जितना अधिक चलेगा, उतनी ही अधिक सार्थक, गंभीर और परिणामोन्मुख चर्चा संभव होगी।

सदन के अध्यक्ष को होना चाहिए पूर्णतः न्यायपूर्ण और निष्पक्ष- स्पीकर

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने कहा कि सदन का अध्यक्ष चाहे किसी भी राजनीतिक दल से निर्वाचित होकर आए, किंतु पीठासीन अधिकारी के रूप में उसका आचरण पूर्णतः न्यायपूर्ण और निष्पक्ष होना चाहिए। सभी मतों और विचारों को स्थान देकर ही हम विधायिका को एक अधिक जवाबदेह, प्रभावी और सशक्त संस्था बना सकते हैं।

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