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UP Lok Sabha Election 2024: भदोही कालीन नगरी बनने की दास्तां, यहां हुए पहले चुनाव में बीएसपी ने खोला खाता

By  Rahul Rana -- May 22nd 2024 04:52 PM
UP Lok Sabha Election 2024: भदोही कालीन नगरी बनने की दास्तां, यहां हुए पहले चुनाव में बीएसपी ने खोला खाता

UP Lok Sabha Election 2024: भदोही कालीन नगरी बनने की दास्तां, यहां हुए पहले चुनाव में बीएसपी ने खोला खाता (Photo Credit: File)

ब्यूरो: Gyanendra Shukla, Editor, UP:  यूपी का ज्ञान में आज चर्चा करेंगे भदोही संसदीय सीट की। भदोही को संत रविदास नगर के नाम से भी जाना जाता है इस जिले के पूरब में वाराणसी और पश्चिम में प्रयागराज है। उत्तर में जौनपुर और दक्षिण में मिर्जापुर जिला है। इसका नाम भर द्रोही  का अपभ्रंश है। भरद्रोही यानि वह क्षेत्र जिसका भरों से द्रोह हो। दरअसल, इस क्षेत्र में भार शासकों का शासन हुआ करता था। 30 जून 1994 को भदोही यूपी का 65वां जिला घोषित किया गया।

ऐतिहासिक आईने में भदोही क्षेत्र

पंद्रहवीं शताब्दी तक “भार” शासकों को सागर राय के साथ मोनास राजपूतों द्वारा हरा दिया गया। अकबर के शासन के दौरान, भदोही को एक दस्तूर बना दिया गया और इलाहाबाद के शासन में शामिल किया गया। मुगल काल में भदोही क्षेत्र सुरियावां के राजा कुलहिया के राज्य में शामिल था। इस शासन के दौरान हुए निर्माण के भग्नावशेष आज भी बावन बिगहिया (जल तारा) के पास मौजूद हैं। बाद में जोधराय ने इस क्षेत्र का शासन शाहजहां के साम्राज्य के अधीन जमींदारी के तौर पर संभाला।

बनारस का हिस्सा बना भदोही

1750 ईस्वी में भू-राजस्व के बकाया का  भुगतान न करने के कारण प्रतापगढ़ के राजा प्रताप सिंह ने इस परगना को बनारस के बलवंत सिंह को सौंप दिया। 1911 में भदोही, महाराजा प्रभु नारायण सिंह द्वारा शासित बनारस रियासत के अधीन शामिल कर लिया गया। अंग्रेजों के दौर में यहाँ आज के ज्ञानपुर क्षेत्र में अदालत की नींव रखी गई। जिसे कोर्ट कहा गया। पर आम जनता उसे कोट कहकर ही संबोधित करती थी। वाराणसी का हिस्सा रहने के बाद आजादी के तकरीबन पांच दशकों के बाद इसे जिले के तौर पर मान्यता मिली।

धार्मिक स्थल व आस्था के केन्द्र

इस क्षेत्र में कई प्रमुख धार्मिक स्थल व आस्था के केन्द्र हैं। इनमें सीता समाहित स्थल सीतामढ़ी सेमराधनाथ महादेव मंदिर, बरम बाबा डुहिया सगरा का हनुमान मंदिर,  ज्ञानपुर का हरिहरनाथ शिव मंदिर, गोपीगंज का कबूतरनाथ, चकवा का महावीर मंदिर प्रमुख हैं।

भदोही कालीन नगरी बनने की दास्तां

यहां कालीन निर्माण की कला की नींव पड़ने की दास्तां दिलचस्प है। दरअसल, अपने शासनकाल में कालीन बुनकरी को बढ़ावा देने के लिए अकबर ने ईरान से कारीगर बुलाए गए।  जयपुर और आगरा में प्रशिक्षण देने के बाद बुनकरों का ये काफिला जीटी रोड से गुजर रहा था। तभी भदोही के माधोसिंह के पास काफिले के एक सदस्य की तबीयत बिगड़ गई। जिसे छोड़कर बाकी लोग गंतव्य को रवाना हो गए। बाद में ग्रामीणों की सेवा से ईरानी कारीगर स्वस्थ हो गया। जिसने लोगों की सेवा से प्रसन्न होकर यहां कालीन के बुनाई का प्रशिक्षण देना शुरु कर दिया।

भदोही के कालीन की अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मांग

यहां के कलात्मक कालीन देखकर अंग्रेज भी मुरीद हो गए। 1850 में यहां के खमरियां मे ई-हिल कम्पनी की स्थापना करके अंग्रेजों ने कालीनों का विदेशों में निर्यात शुरु कर दिया। बाद में अंग्रेजों ने भदोही में टेलरी एंड संस और गोपीगंज मे ओबीटी कंपनी बना कर कालीन उद्योग पर अपना कब्जा जमा लिया। आजादी के वक्त कालीन निर्यात एक करोड़ रुपए तक जा पहुंचा था। यहाँ लगभग 63000 कारीगर इस कार्य से जुड़े हैं।  भदोही जिले में कुल लूमों की संख्या 1 लाख से अधिक है तथा 500 से अधिक निर्यात इकाइयाँ यहाँ कार्यरत हैं। यहां के हस्तनिर्मित कालीन अंतर्राष्ट्रीय बड़े बाज़ारों में बहुत लोकप्रिय हैं। वर्ष 2007 से 09 तक अमेरिका में छाई वैश्विक मंदी का असर कालीन उद्योग पर पड़ा था। हालांकि अब फिर से ये कारोबार संभल चुका है। यहां की ज्ञानपुर सीट से चार बार विधायक रहे विजय मिश्रा बाहुबली नेता है। जिस पर 83 मुकदमे हैं। गायिका दुष्कर्म केस में पन्द्रह साल की सजा पाकर जेल की सलाखों में बंद है।

यहां हुए पहले चुनाव में बीएसपी ने खाता खोला

साल 2008 में परिसीमन के बाद भदोही लोकसभा सीट अस्तित्व में आई, पहले इसके तमाम हिस्से मिर्जापुर-भदोही लोकसभा सीट में शामिल थे। साल 2009 में भदोही संसदीय सीट पर हुए लोकसभा चुनाव में बीएसपी प्रत्याशी गोरख नाथ पांडेय सांसद चुने गए। जिन्होंने 195808 वोट पाकर सपा के छोटेलाल बिंद को 12,963 वोटों से पराजित किया। तब यहां से चुनाव लड़े बीजेपी के डॉ. महेंद्र नाथ पांडेय को 57,672 वोट ही मिल सके थे।  

बीते दो आम चुनावों में बीजेपी का परचम फहराया

साल 2014 की मोदी लहर में यहां बीजेपी के वीरेंद्र सिंह मस्त को जीत मिली। उन्होंने 4,03,695 वोट हासिल किए, बीएसपी के राकेश धर त्रिपाठी को 2,45,554 वोट मिल सके।  वीरेंद्र सिंह ने यह मुकाबला 1,58,039 वोटों के मार्जिन से जीत लिया।  2019 में बीजेपी प्रत्याशी रमेश चंद्र बिंद चुनाव जीते। उन्हें 510,029 वोट मिले जबकि सपा-बीएसपी गठबंधन के तहत बीएसपी से चुनाव लड़े पूर्व मंत्री रंगनाथ मिश्रा को 4,66,414 वोट मिले। कांटे की लड़ाई के बाद बीजेपी ने ये सीट 43,615 वोटों के मार्जिन से जीत ली। तब कांग्रेस ने बाहुबली रमाकांत यादव को मैदान में उतारा था, अब रमेश बिंद सपा में शामिल हो चुके है और मिर्जापुर सीट से सपा गठबंधन के प्रत्याशी हैं।

वोटरों की तादाद और जातीय समीकरण

इस सीट पर 20,09, 146 वोटर हैं। जिनमें  ब्राह्मण 3.15 लाख हैं। बिंद 2.90लाख हैं। इसके साथ ही 2.60 लाख दलित ढाई लाख मुस्लिम, 1.40 लाख यादव हैं। वहीं, 1 लाख, 95 हजार मौर्य, 85 हजार पाल, 75 हजार पटेल व अन्य बिरादरियां 1.50 लाख के करीब हैं। इस सीट पर ब्राह्मण और निषाद वोटर निर्णायक होते रहे हैं।

बीते विधानसभा चुनाव में सपा का पलड़ा रहा भारी

भदोही संसदीय सीट के तहत पांच विधानसभाएं शामिल हैं। भदोही की ज्ञानपुर, औराई सुरक्षित और भदोही सदर तथा प्रयागराज की प्रतापपुर और हंडिया विधानसभा सीट इसका हिस्सा हैं। साल 2022 के विधानसभा चुनाव में यहां तीन सीटों पर सपा काबिज हुई। एक पर बीजेपी और एक सीट बीजेपी की सहयोगी निषाद पार्टी को मिली।  ज्ञानपुर से निषाद पार्टी के विपुल दुबे, औराई से बीजेपी के दीनानाथ भास्कर, भदोही से सपा के जाहिद बेग हंडिया से सपा के हाकिम लाल बिंद और प्रतापपुर से सपा की विजमा यादव विधायक हैं।

मौजूदा चुनावी जंग पर डटे सियासी योद्धा

बीजेपी ने इस बार यहां डा विनोद बिंद पर दांव लगाया है। तो सपागठबंधन की ओर से सूबे की इस इकलौती सीट को तृणमूल कांग्रेस यानि टीएमसी को दिया गया है। उसकी ओर से ललितेशपति त्रिपाठी चुनावी मैदान मे हैं। तमाम बदलाव के  बाद अब बीएसपी से हरिशंकर सिंह उर्फ चौहान दादा प्रत्याशी हैं।

चुनावी मैदान में उतरे प्रत्याशियों का ब्यौरा

बीजेपी के डा विनोद बिंद चंदौली के कवई पहाड़पुर गांव के मूल निवासी हैं। वर्तमान में वह मिर्जापुर की मझवां विधानसभा सीट से निषाद पार्टी के  विधायक है।  मोतीलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस करने वाले डा बिंद मुगलसराय में रमा ट्रामा एंड फ्रैक्चर हॉस्पिटल संचालित करते हैं। 2021 में सपा ने इन्हें भदोही की ज्ञानपुर विधानसभा सीट से प्रत्याशी बनाया था, लेकिन इन्होंने सपा का टिकट वापस कर दिया. उसके बाद मझवां विधानसभा सीट से निषाद पार्टी से चुनाव लड़ा और जीता। ललितेशपति त्रिपाठी की बात करें तो वो यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री कमलापति त्रिपाठी के परपौत्र हैं। मिर्जापुर के मड़िहान विधानसभा से 2012 में कांग्रेस के विधायक रह चुके हैं। 2019 में मिर्जापुर से कांग्रेस प्रत्याशी के तौर पर लोकसभा चुनाव भी लड़े पर हार गए। 2021 में वो कांग्रेस छोड़कर टीएमसी में चले गए थे. पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने उन्हें पार्टी की सदस्यता दिलाई थी। वहीं, इस सीट पर बीएसपी जबरदस्त कंफ्यूजन में नजर आई। पार्टी ने पहले पीखानपुर के सभासद डा मोहम्मद अतहर अंसारी को टिकट दिया। फिर बदलकर इरफान अहमद उर्फ बबलू को प्रत्याशी घोषित किया पर उन्हें मजबूती से न लड़ते देख इस सीट पर हरिशंकर सिंह उर्फ दादा चौहान चुनाव में उतारा। सुरियावां के कौड़र निवासी हरिशंकर 2022 के विधानसभा चुनाव में भदोही सीट से बीएसपी से चुनाव लड़े थे और तीसरे पायदान पर रहे थे। बहरहाल, भदोही सीट पर चुनावी मुकाबला त्रिकोणीय बना हुआ है।

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