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UP Lok Sabha Election 2024: चुनावी इतिहास के आईने में बलिया सीट, बीते दो आम चुनावों में बीजेपी ने फहराया परचम

By  Rahul Rana -- May 27th 2024 01:25 PM
UP Lok Sabha Election 2024: चुनावी इतिहास के आईने में बलिया सीट, बीते दो आम चुनावों में बीजेपी ने फहराया परचम

UP Lok Sabha Election 2024: चुनावी इतिहास के आईने में बलिया सीट, बीते दो आम चुनावों में बीजेपी ने फहराया परचम (Photo Credit: File)

ब्यूरो: Gyanendra Shukla, Editor, UP:  यूपी का ज्ञान में आज चर्चा करेंगे बागी शहर बलिया संसदीय सीट की। इसके एक तरफ गाजीपुर है तो दूसरी तरफ बिहार का बॉर्डर है यूपी का ये सबसे पूर्वी जिला प्रशासनिक  तौर से आजमगढ़ मंडल का हिस्सा है। गंगा और घाघरा नदियों के संगम के नजदीक बसा हुआ ये जिला ऐतिहासिक तौर से अद्वितीय रहा है। देश के स्वाधीनता संग्राम में यहां के निवासियों के विद्रोही तेवर की वजह से इसे  "बागी बलिया" के नाम से भी संबोधित किया जाता है।

जनश्रुतियां और पौराणिक महत्व की गाथाएं

वीर लोरिक का इतिहास भी इसी जिले से संबद्ध है। लोरिक और अगोरी राज्य की मंजरी की प्रेम कहानी पूर्व इलाके की जनश्रुतियों का हिस्सा है। लोरिक की वीरता के बारे में किवदंतियां प्रचलित हैं कि उन्होंने अपनी तलवार के एक ही वार से पत्थर को दो टुकड़ों में बांट दिया था। यहां हंसनगर के बारे में कथा प्रचलित है कि यहां पवित्र गंगा नदी का जल पीने से एक हंस एक आदमी और एक कौवा हंस में बदल गया। बलिया के नजदीक धर्मार्नव पोखरा नामक एक प्राचीन स्थल पर खुदाई से तपोस्थली होने के प्रमाण मिले हैं। पौराणिक मान्यता के अनुसार जमदग्नि, वाल्मीकि, भृगु, दुर्वासा आदि के आश्रम बलिया में ही थे। भृगु ऋषि की तपोस्थली यहीं थी।  

18वीं सदी के उत्तरार्ध में बलिया ब्रिटिश हुकूमत का हिस्सा बना

मौर्य और गुप्त वंश के आधीन रहा ये क्षेत्र। पुष्यमित्र शुंग के शासनकाल के पतन बाद ये क्षेत्र कोसल राज्य के अधीन रहा। एक दौर तक यहां बुद्ध धर्म का प्रभाव रहा। यहां का रसड़ा "छोटी काशी" और "नाथ नगरी" की उपाधियों से भी जाना जाता है। 29 दिसम्बर 1764 ई0 को इस क्षेत्र पर ईस्ट इंडिया कंपनी का आधिपत्य स्थापित हो गया।

आजादी का संघर्ष और बलिया का योगदान

बलिया के नगवां गांव में जन्मे थे मंगल पाण्डेय। 29 मार्च 1857 की जंगे आजादी का आगाज मंगल पाण्डेय ने ही किया था। बैरकपुर परेड मैदान में उन्होंने मेजर ह्यूसन को गोली मार दी तथा लेफ्टिनेंट बाग को तलवार से काट दिया था। स्वाधीनता संग्राम में बलिया का योगदान लगातार जारी रहा। भारत छोड़ो आंदोलन में प्रबल हुंकार भरने वाले चित्तू पाण्डेय थे  भारत के इस स्वतंत्रता संग्राम सेनानी को 'बलिया का शेर' भी कहा जाता है। 19 अगस्त 1942 को एक 'राष्ट्रीय सरकार' की घोषणा करके वे उसके अध्यक्ष बने जो कुछ दिन चलने के बाद अंग्रेजों द्वारा इस आंदोलन को कुचल दिया गया। पर अपने अल्प कार्यकाल में यह सरकार बलिया के कलेक्टर को सत्ता त्यागने एवं सभी गिरफ्तार कांग्रेसियों को रिहा कराने में सफल हुई थी। चित्तू पांडेय स्वयं को गांधीवादी मानते थे। इस आंदोलन के दौरान बलिया ही देश का पहला जिला था जो पांच साल पहले ही कुछ दिनों के लिए आजाद घोषित हो गया था। पूरे जिले के कुल 84 लोगों ने दमनकारी अंग्रेजी शासकों से संघर्ष करते हुए जीवन बलिदान किया। यहां के स्वतंत्रता सेनानी सवरूबांध गांव के निवासी बच्चन पाण्डेय ने सिंकदरपुर पुल कांड में अहम भूमिका निभाई थी। जिसमें अंग्रेजों से मुकाबले के लिए पुलिया को विस्फोट से उड़ा दिया गया था। पूर्व में बलिया क्षेत्र गाजीपुर जिले का एक हिस्सा हुआ करता था लेकिन लगातार अशांत रहने के बाद अंग्रेजों ने इस 1 नवम्बर सन् 1879 को इस क्षेत्र को गाजीपुर से अलग करके पूर्ण  जिला बना दिया।

बलिया की प्रमुख हस्तियां और दर्शनीय स्थल

मंगल पांडेय, चित्तू पांडेय सरीखे आजादी के नायकों की धरती बलिया में ही देश के पूर्व प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर, आपातकाल के नायक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी जयप्रकाश नारायण का जन्म हुआ था। छोटे लोहिया के नाम से मशहूर समाजवादी चिंतक जनेश्वर मिश्र, साहित्य जगत की मूर्धन्य हस्ती हजारी प्रसाद द्विवेदी,  कथाकार अमरकांत, प्रसिद्ध कवि केदारनाथ सिंह भी यहीं के थे। यहां के प्रमुख स्थलों का जिक्र करें तो यहां का सुरहा ताल,पक्षी अभयारण्य, हनुमान मंदिर,चित्रगुप्त मंदिर,राम जानकी मंदिर, कामेश्वर धाम,  बाबा बालेश्वर नाथ मंदिर और भृगु आश्रम अति प्रसिद्ध हैं। गंगा और सुरहा ताल से संबंधित छह महीने सीधे और छह महीने उलटा प्रवाहित होने वाला कटहल नाला, दुल्हनिया पोखरा यहां के दर्शनीय स्थल हैं।

उद्योग धंधे और विकास का आयाम

बलिया की मिट्टी औद्योगिक दृष्टिकोण से बहुत महत्त्वपूर्ण है। वहीं इस जिले के मनियार में बिंदी (टिकुली) का निर्माण बहुतायत में किया जाता है। कुटीर उद्योग के तौर पर बिंदी निर्माण के काम में आबादी का बड़ा हिस्सा शामिल है। ये काम जिले के ओडीओपी (वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट) योजना के तहत भी शामिल किया गया है। यहां पहले यहां शीशे को गला कर बिंदी बनती थी...जिस पर  सोने और चांदी का पानी भी चढ़ाया जाता था। वर्ष  1975 के आसपास शीशे की बिंदी का चलन खत्म हुआ और बाजारों में नए किस्म की बिंदी आने लगी। बलिया के लगभग 150 गांवों की लगभग 16 हजार 666 परिवार इसी काम से जुड़े हैं। जिनमें महिलाओँ की तादाद ज्यादा है। बलिया में प्रतिवर्ष औसतन 25 से 30 करोड़ का बिंदी का कारोबार होता है। पिछले साल हुए इन्वेस्टर्स समिट के  आयोजन के दौरान यहां 76 निवेशकों ने निवेश प्रस्तावों पर हस्ताक्षर किए हैं। डेढ़ दर्जन इकाईयां जल्द संचालित हो जाएंगी। यहां जार्डन की सुकुर अल्प इबादी, अल सुकुर कंपनी फार इंजीनियरिंग एंड कंस्ट्रक्शन कंपनी ने 170 करोड़ रुपये से दवा का निर्माण का काम शुरू करेगी तो भोजपुर काटन एंड सिंथेटिक मिल के जरिए भी सैकड़ों की तादाद में युवाओं को रोजगार मिलने की उम्मीद है।

चुनावी इतिहास के आईने में बलिया सीट

आजादी की लड़ाई मे महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले बलिया में साल 1952 में हुए पहले चुनाव में बलिया लोकसभा क्षेत्र का कुछ हिस्सा गाजीपुर में हुआ करता था, जिसे गाजीपुर पूर्वी संसदीय क्षेत्र के नाम से जाना जाता था। बलिया से निर्दलीय प्रत्याशी मुरली मनोहर लाल ने मदन मोहन मालवीय के पुत्र व कांग्रेस प्रत्याशी गोविंद मालवीय को  6431 वोटों से हरा दिया था। साल 1957 में कांग्रेस के राधा मोहन सिंह सांसद बने।1962 के चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार के तौर पर  मुरली मनोहर लाल दूसरी बार भी सांसद निर्वाचित हुए। 1967 और 1971 में कांग्रेस के चंद्रिका प्रसाद दो बार सांसद बने।

युवा तुर्क नेता के तौर पर चन्द्रशेखर का उदय

जयप्रकाश नारायण ने कांग्रेस के खिलाफ देशव्यापी आंदोलन छेड़ा तो बलिया के चंद्रशेखर ने उसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और युवा तुर्क की उपाधि से जाने जाने लगे। इस सीट पर 1984 को अपवाद के तौर पर छोड़ दिया जाए तो लगातार बलिया संसदीय सीट पर चन्द्रशेखर ने ही जीत दर्ज की। आपातकाल के बाद 1977 के चुनाव में पूर्व पीएम चंद्रशेखर भारतीय लोक दल से पहली बार सांसद चुने गए। 1980 में वह जनता पार्टी के प्रत्याशी के तौर पर चुनाव जीते।  लेकिन 1984 में कांग्रेस के जगन्नाथ चौधरी ने उन्हें पराजित कर दिया। लेकिन 1989 के चुनाव में जनता दल के टिकट से चंद्रशेखर तीसरे बार सांसद बने। इसी

दौरान 10 नवंबर 1990 से 20 जून 1991 तक देश के प्रधानमंत्री भी रहे। साल 1991 1996 1998 1999 और 2004 में समाजवादी जनता पार्टी के तौर पर लगातार चुनावी फतेह हासिल की। इस तरह से पूर्व पीएम  चंद्रशेखर ने कुल आठ बार इस लोकसभा क्षेत्र की संसद में नुमाइंदगी की। जीवन पर्यंत वह यहां से सांसद रहे। उनके निधन के बाद हुए 2008 के उपचुनाव और फिर 2009 के आम चुनाव में इस सीट से चंद्रशेखर के  बेटे नीरज शेखर बतौर समाजवादी पार्टी उम्मीदवार चुनाव जीते।

बीते दो आम चुनावों में बीजेपी का परचम फहराया

साल 2014 की मोदी लहर में बीजेपी के भरत सिंह ने नीरज शेखर को एक लाख 40 हजार वोटों से पराजित कर दिया। तब इस सीट पर बीजेपी ने वीरेन्द्र सिंह मस्त पर दांव आजमाया। तो अखिलेश यादव ने नीरज शेखर का टिकट काटकर सनातन पांडेय को सपा प्रत्याशी बनाया।  पर वीरेन्द्र सिंह 4,69,114 वोट पाकर सनातन पांडेय को कांटेदार मुकाबले में महज 15519 वोट से ही मात दे सके। बाद में नीरज शेखर बीजेपी में शामिल हो गए और बीजेपी ने उन्हें राज्यसभा सदस्य बनवा दिया।

वोटरों की तादाद और जातीय समीकरण

इस संसदीय सीट पर  19,23,645 वोटर हैं। जिनमें सर्वाधिक 15.5 फीसदी दलित हैं। दूसरी बड़ी आबादी 15 फीसदी ब्राह्मणों की है। 13 फीसदी क्षत्रिय, 12 फीसदी यादव, 8.03 फीसदी मुस्लिम, 8 फीसदी भूमिहार और 2.6 फीसदी अनुसूचित जनजाति के वोटर हैं।

बीते विधानसभा चुनाव में सपा का पलड़ा रहा भारी

बलिया लोकसभा सीट के तहत पांच विधानसभा सीटें शामिल हैं। बलिया की फेफना, बलिया नगर और बेरिया सीटें। जबकि गाजीपुर की जहूराबाद और मोहम्मदाबाद भी इसी का हिस्सा है। साल 2022 के विधानसभा चुनाव में तीन पर सपा, एक पर सुभासपा और महज एक सीट पर ही बीजेपी जीत सकी थी। फेफना से सपा के संग्राम सिंह, बलिया नगर से बीजेपी के दयाशंकर सिंह, बेरिया से सपा के जय प्रकाश अंचल, जहरूबाद से सुभासपा के मुखिया ओम प्रकाश राजभर और मोहम्मदाबाद से सपा के मुन्नू अंसारी विधायक हैं।

साल 2024 की चुनावी जंग कांटेदार

मौजूदा चुनावी जंग के लिए बीजेपी ने इस बार चंद्रशेखर की इस सियासी कर्मभूमि पर उनके बेटे नीरज शेखर को मैदान में उतारा है। सपा ने  सनातन पांडेय को प्रत्याशी बनाकर ब्राह्मण कार्ड चला है तो बीएसपी ने लल्लन सिंह यादव के जरिए दलित-ओबीसी कार्ड चल दिया है।

चुनाव लड़  रहे प्रत्याशियों का ब्यौरा

बीजेपी प्रत्याशी नीरज शेखर बलिया से दो बार सपा के सांसद रह चुके हैं। 2014 की मोदी लहर में चुनाव हारे तो सपा ने राज्यसभा भेज दिया था। पर 2019 में सपा ने टिकट काट दिया तो क्षुब्ध होकर बीजेपी में शामिल हो गए। वर्तमान में बीजेपी से राज्यसभा सदस्य हैं। वहीं, बलिया के रसड़ा के पांडेयपुर निवासी। सनातन पांडेय 1980 में आजमगढ़ से पॉलि‍टेक्निक की पढ़ाई करके गन्ना विकास परिषद में जेई नियुक्त हो गए। 1996 में नौकरी से इस्तीफा देकर सपा से जुड़े। पार्टी का टिकट न मिलने पर 1997 व 2002 में चिलकहर विधानसभा सीट से निर्दलीय लड़े पर हार गए।  2007 में सपा के टिकट से चुनाव जीतकर विधायक बने।  2012 में नए परिसीमन में चिलकहर सीट का अस्तित्व खत्म हो गया तो सपा ने रसड़ा से चुनाव लड़ाया पर बीएसपी के उमाशंकर सिंह से हार गए। 2016 में यूपी के पर्यटन एवं संस्कृति विभाग के सलाहकार नियुक्त हुए। 2017 में भी रसड़ा सीट से लड़े पर हार गए। हालांकि साल 2019 में बलिया संसदीय सीट पर बीजेपी के वीरेन्द्र सिंह मस्त को कांटे की टक्कर दी। वहीं, गाजीपुर के नोनहरा के चौरही गांव निवासी लल्लन सिंह यादव पूर्व फौजी हैं। साल 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान उनके पैर में बारूद के गोले से चोट लगी थी। तत्काल एयरलिफ्ट कर आर्मी अस्पताल ले जाए गए। 2009 में सेना से रिटायर हुए 2017 से बीएसपी से जुड़ गए। 2022 में गाजीपुर सदर विधानसभा से बीएसपी से टिकट चाहते थे पर नहीं मिल सका अब सांसद बनने की राह पर दांव आजमा रहे हैं। बहरहाल, बागियों की सरजमीं बलिया में चुनावी मुकाबला बेहद सरगर्म है। महर्षि भृगु की धरती पर जातीय गोलबंदी  चरम पर है। बाकी धरा का विजेता बनने के लिए मुकाबला त्रिकोणीय बना हुआ है।

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