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UP Lok Sabha Election 2024:चुनावी इतिहास के आईने में बांदा संसदीय सीट, नब्बे के दशक के बाद कांग्रेस नहीं खोल सकी खाता

By  Rahul Rana -- May 17th 2024 11:10 AM -- Updated: May 17th 2024 01:48 PM
UP Lok Sabha Election 2024:चुनावी इतिहास के आईने में बांदा संसदीय सीट, नब्बे के दशक के बाद कांग्रेस नहीं खोल सकी खाता

UP Lok Sabha Election 2024:चुनावी इतिहास के आईने में बांदा संसदीय सीट, नब्बे के दशक के बाद कांग्रेस नहीं खोल सकी खाता (Photo Credit: File)

ब्यूरो: Gyanendra Shukla, Editor, UP: यूपी का ज्ञान में आज चर्चा करेंगे बांदा संसदीय सीट की। उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड इलाके में केन नदी के तट पर बसा जिला है बांदा। साल 1998 में यहां की कर्वी और मऊ तहसीलों को मिलाकर चित्रकूट नाम के नए जिले का गठन किया गया। इसके बाद बांदा जिले में 5 तहसील बबेरू, बांदा,अतर्रा, पेलानी और नरैनी रह गए। चित्रकूटधाम नाम से नई कमिश्नरी का गठन किया गया जिसका मुख्यालय बांदा बनाया गया. इस मंडल के तहत बुंदेलखंड के बांदा, हमीरपुर, महोबा और चित्रकूट जिले शामिल किए गए



पौराणिक मान्यताओं से भरपूर है ये संसदीय क्षेत्र

प्राचीन काल में केन नदी का नाम कर्णावती हुआ करता था। इस क्षेत्र के सबसे पहले ज्ञात शासक ययाति को  माना जाता है जिनके ज्येष्ठ पुत्र यदु को यह क्षेत्र विरासत में मिला था। बाद में उनके वंशजों ने इस इलाके का नाम चेदि-देश रख दिया।  यहां पर कालिंजर के नाम की एक पहाड़ी है जिसे अति पवित्र माना जाता है. वेदों में भी इसका उल्लेख किया गया है। कहते हैं कि प्रसिद्ध कालिंजर-पहाड़ी (कलंजराद्री) का नाम भगवान शिव के नाम पर है, जो कालिंजर के मुख्य देवता हैं। ऐसी मान्यता है कि भगवान राम ने अपने 14 साल के निर्वासन के दौरान 12 साल यहां के चित्रकूट में व्यतीत किए थे। कुछ अरसा पहले तक चित्रकूट बांदा जिले का ही हिस्सा हुआ करता था। बांदा शहर का नाम बामदेव नाम के महान ऋषि के नाम पर पड़ा. पहले इसे बाम्दा कहते थे फिर बाद में बांदा कहा जाने लगा।

प्राचीन काल से मध्य युग का सफर

प्राचीन इतिहास के अनुसार नंद वंश के बाद यहां मौर्य और शुंग वंश का शासन रहा। फिर कण्व, कुषाण, नागा और गुप्त वंश का भी आधिपत्य रहा....यह बाद में हर्षवर्धन के शासन के आधीन आ गया। चीनी यात्री ह्वेनसांग ने इसका वर्णन चिह-ची-टू और खजुराहो की राजधानी के तौर पर किया। कलचुरी, प्रतिहारों से होते हुए यहां चंदेल वंश का शासन हुआ। महमूद गजनवी ने यहां असफल आक्रमण किया। तेरहवीं शताब्दी में कुतुबुद्दीन ऐबक फिर लोदी सुल्तानों का यहां कब्जा हुआ। 1545 में शेरशाह सूरी ने कालिंजर का किला घेर लिया था पर जंगी कार्रवाई की अवधि में ही उसकी मृत्यु हो गई। अकबर के शासनकाल में बीरबल ने कालिंजर को अपनी राजधानी बना लिया। बाद में यहां मराठों से होते हुए अंग्रेजों का कब्जा हो गया। 1819 में बांदा शहर को दक्षिण बुंदेलखंड का मुख्यालय बनाया गया। यहां आजादी की जंग को सख्ती के साथ कुचल दिया गया। आजादी पाने के लिए संघर्षरत महात्मा गांधी ने 1929 में यहां दौरा किया था तो चन्द्रशेखर आजाद और सुभाष चन्द्र बोस भी यहां पधारे थे।

बांदा जिले के बहुआयामी पहलू

यहां की केन नदी में मिलने वाला 'शजर' पत्थर बहुत मशहूर है। एक वक्त में ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया इस पत्थर को साथ ले गईं। मक्का जाने वाले हजयात्री इस पत्थर को लेकर जाना पसंद करते हैं। इन पत्थरों को तराश कर इन पर कलाकृतियां व आयतें लिखी जाती है। इन तैयार पत्थरों की खाड़ी की देशों में बड़ी मांग रहती है। बांदा का संकट मोचन हनुमान मंदिर, बामदेश्वर मंदिर अति प्रसिद्ध है।

चुनावी इतिहास के आईने में बांदा संसदीय सीट

साल  1957 में हुए यहां के पहले चुनाव में कांग्रेस के राजा दिनेश सिंह जीते। 1962 में सावित्री निगम को जीत मिली। 1967 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) के जागेश्वर यादव  सांसद बने। जनसंघ के राम रतन शर्मा ने 1971 में जीत अर्जित की। 1977 में जनता पार्टी के अंबिका प्रसाद पांडे विजयी हुए। 1980 में कांग्रेस के रामनाथ दुबे जीते। 1984 में कांग्रेस के भीष्म देव दुबे को यहां कामयाबी मिली। 1989 में सीपीआई के राम सजीवन सांसद चुने गए।

नब्बे के दशक के बाद से कांग्रेस नहीं खोल सकी यहां खाता

साल 1991 में राम मंदिर आंदोलन की लहर में प्रकाश नारायण त्रिपाठी की जीत ने बीजेपी का खाता खोल दिया। 1996 में बीएसपी के राम सजीवन ने यहां जीत दर्ज की। 1998 में बीजेपी के रमेश चंद्र द्विवेदी जीत गए। 1999 में राम सजीवन ने एक बार फिर बीएसपी के लिए जीत हासिल की। साल 2004 में यहां से सपा के श्यामाचरण गुप्ता ने अपनी पार्टी के लिए खाता खोला। 2009 में फिर सपा जीती तब आर के सिंह पटेल यहां से सांसद बने।

बीते दो आम चुनावों में यहां बीजेपी का प्रभुत्व हुआ कायम

साल 2014 की मोदी लहर मे बीजेपी के भैरों सिंह मिश्रा ने बीएसपी के टिकट पर चुनाव लड़ने वाले आरके सिंह पटेल को 1,15,788 वोटों के मार्जिन से हरा दिया। साल 2019 में आर के सिंह पटेल बीजेपी में शामिल हो गए और उन्होने सपा के श्यामा चरण गुप्ता को 58,938 वोटों से मात दे दी। आरके सिंह पटेल ने 477,926 वोट हासिल किए तो श्यामा चरण गुप्ता को 418,988 वोट मिले। वहीं 75,438 वोट पाकर कांग्रेस के बाल कुमार पटेल तीसरे पायदान पर रहे।

वोटरों की तादाद और जातीय समीकरण

तकरीबन 20.62 लाख वोटरों वाली ये संसदीय सीट  ब्राह्मण और कुर्मी बाहुल्य मानी जाती है। यहां के छह लाख सवर्ण वोटरो में तीन लाख ब्राह्मण हैं। जबकि 3.50 लाख दलित, 2 लाख  कुर्मी, डेढ़ लाख यादव वोटर है। 90 हजार वैश्य, 80 हजार निषाद और 60 हजार कुशवाहा बिरादरी के वोटर हैं। जबकि एक लाख के करीब मुस्लिम वोटर हैं।

बीते विधानसभा चुनाव में सपा और बीजेपी को मिली दो-दो सीटें

बांदा संसदीय सीट के तहत बांदा जिले की बांदा सदर, बबेरू, नरैनी सुरक्षित विधानसभा और चित्रकूट जिले की चित्रकूट सदर व मानिकपुर विधानसभा शामिल हैं। 2022 के विधानसभा चुनाव में 2 सीटों पर बीजेपी तो 2 सीटों पर समाजवादी पार्टी को जीत मिली, जबकि एक सीट अपना दल के खाते में गई थी। बबेरू से सपा के विशंभर सिंह यादव, नैरेनी सुरक्षित से बीजेपी के ओम मणि वर्मा, बांदा से बीजेपी के प्रकाश द्विवेदी, चित्रकूट से सपा के अनिल  प्रधान पटेल, मानिकपुर से अपना दल के अविनाश चन्द्र द्विवेदी विधायक हैं।

चुनावी बिसात पर संघर्षरत हैं सियासी योद्धा

इस बार के चुनाव के लिए फिर से बीजेपी ने निर्वतमान सांसद आरके सिंह पटेल पर ही दांव लगाया है। सपा ने पूर्व राज्यमंत्री शिव शंकर सिंह पटेल को उतारा है जबकि बीएसपी से मयंक द्विवेदी ताल ठोक रहे हैं। साल 2022 में सपा में शामिल हुए शिव शंकर सिंह पटेल बबेरू सीट से विधायक रहे थे बीजेपी सरकार में मंत्री भी हुआ करते थे। मयंक द्विवेदी के पिता नरेश द्विवेदी साल 2007 मे नरैनी से  बीएसपी विधायक थे। साल 2017 में मयंक की  पत्नी विनीतिका द्विवेदी जिला पंचायत बनी, तो पिछले साल जिला पंचायत के चुनावों मे मयंक सदस्य का चुनाव जीते थे। बहरहाल, पौराणिक ऐतिसाहिक शहर बांदा में चुनावी संग्राम त्रिकोणीय बना हुआ है।

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