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UP Lok Sabha Election 2024: गोंडा जिले का पौराणिक व ऐतिहासिक महत्व, नब्बे के दशक से यहां बृजभूषण सिंह ने जमाई धाक

By  Rahul Rana -- May 18th 2024 12:09 PM
UP Lok Sabha Election 2024: गोंडा जिले का पौराणिक व ऐतिहासिक महत्व, नब्बे के दशक से यहां बृजभूषण सिंह ने जमाई धाक

UP Lok Sabha Election 2024: गोंडा जिले का पौराणिक व ऐतिहासिक महत्व, नब्बे के दशक से यहां बृजभूषण सिंह ने जमाई धाक (Photo Credit: File)

ब्यूरो: Gyanendra Shukla, Editor, UP:  यूपी का ज्ञान में आज चर्चा करेंगे यूपी की गोंडा संसदीय सीट की। पूर्वांचल में घाघरा नदी के उत्तर में स्थित गोंडा देवीपाटन मंडल का हिस्सा है। जिला मुख्यालय और देवीपाटन मंडल का मुख्यालय यहीं है। इसके उत्तर में बलरामपुर, पश्चिम में बहराइच, पूर्व में बस्ती तथा दक्षिण में बाराबंकी और फैजाबाद जिला स्थित है। जिले में घाघरा, सरयू और कुआनो 3 प्रमुख नदियां बहती हैं।  इस जिले के तहत 4 तहसीलें गोंडा, मनकापुर, करनैलगंज और तरबगंज शामिल हैं।

गोंडा जिले का पौराणिक व ऐतिहासिक महत्व

गोंडा नाम का मूल स्रोत गोनार्द को माना जाता है जिसका अर्थ होता है वह स्थल जहां गाएं विचरण करती हैं, इस क्षेत्र में अयोध्या के राजा श्री राम की गाएं चरा करती थीं। पाणिनी की अष्टाध्यायी पर महाभाष्य लिखने वाले महर्षि पतंजलि ने खुद को गोनर्दीय बताया है। कामसूत्र में भी गोनार्दीय मत का जिक्र किया गया है। यह क्षेत्र वनों से आच्छादित रहा था। पौराणिक मान्यता के अनुसार यहां की परसपुर तहसील के मुकुंदपुर क्षेत्र में वराह अवतार का आगमन हुआ था। अयोध्या के करीब होने की वजह से इस क्षेत्र में बड़ी संख्या में ऋषि-मुनियों का आना-जाना रहा था, ऋषि वशिष्ठ का आश्रम भी यहीं हुआ करता था। प्राचीन काल में ये क्षेत्र कोशल महाजनपद का हिस्सा हुआ करता था। मध्यकाल में ये कई बार उजड़ा।

मध्यकाल से आधुनिक काल तक का गोंडा का सफर

विशेन वंश के राजा मान सिंह ने साल 1620 में गोंडा को अपनी राजधानी बनाया। बाद में ये क्षेत्र मुगलों के आधीन आ गया। फरवरी 1856 में यहां का आधिपत्य अवध के नवाबों के पास से अंग्रेजी शासकों के पास आ गया। 7 फरवरी 1856 गोंडा जिला अस्तित्व में आया। जिले के पहले कलेक्टर कर्नल ब्यालू के दमनकारी रवैये से तंग आकर फजल अली ने सकरौरा छावनी में घुसकर उसकी गर्दन काट डाली थी।

आजादी की जंग में गोंडा का अतुलनीय  योगदान

गोंडा नरेश महाराजा देवी बक्श सिंह की शौर्य गाथा आज भी लोगों को प्रेरित करती है। उन्होने जंगे आजादी में बेगम हजरतमहल का साथ दिया। इनके ही आह्वान पर रानी तुलसीपुर ईश्वर कुंवरि ने अंग्रेजों से मुकाबले के लिए एक बड़ी सेना गठित की थी। अंग्रेजों द्वारा पीछा किए जाने पर बेगम हजरत महल, शहजादी बिरजिस कद्र, नानाजी व बाला जी राव ने भी आकर तुलसीपुर रानी के यहां शरण ली। शरणार्थियों की रक्षा के लिए वे युद्ध से पीछे हट गईं और सभी को लेकर नेपाल चली गईं।  वहां भी तुलसीपुर के नाम से नगर बसाया जो आज दांग जिले का मुख्यालय है।  बौंडी स्थित महाराजा हरिदत्त सिंह सवाई ने क्रांतिकारियों का हरसंभव साथ दिया। बाद में अँग्रेजी फौजों ने इनके किलो को तोपों से तहस नहस कर दिया।

प्रमुख आस्था केन्द्र और उद्योग धंधे

इस जिले का  पृथ्वीनाथ मंदिर, श्री स्वामीनारायण मंदिर और वाराही देवी का मंदिर अति प्रसिद्ध है। मशहूर कवि रामनाथ सिंह उर्फ अदम गोंडवी यहीं के थे।  यहां शुगर मिल बहुतायत में हैं। देश की बड़ी शुगर मिलों में से एक कुंदरखी में मौजूद है। यहां औद्यानिक फसलों एवं खाद्य अनाज जैसे दाल, गन्ना, भुट्टा आदि की फसलों की उपज होती है। खाद्य  प्रसंस्करण यहां का बड़ा कारोबार है। इंवेस्टर्स समिट के दौरान 197 निवेशकों ने यहां पन्द्रह सौ करोड़ के करीब निवेश के बाबत सहमति जताई थी। यहां 415.35 करोड़ के उद्योग जमीन पर लगने शुरू हो चुके हैं। इससे इस पिछड़े क्षेत्र में विकास को नया आयाम मिलने की उम्मीद है।

चुनावी इतिहास के आईने में गोंडा संसदीय सीट

साल 1952 में इसे गोंडा उत्तर सीट नाम से जाना जाता था। चौधरी हैदर हुसैन यहां के पहले सांसद चुने गए। 1957 में कांग्रेस के दिनेश प्रताप सिंह जीते। जबकि 1962 के चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी के पक्ष में प्रचार करने पहुंचे तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को मनकापुर मे काले झंडे दिखाए गए। तब चुनाव में कांग्रेस के टिकट से कारोबारी रामरतन गुप्ता जीत तो गए लेकिन 498 वोटों से पिछड़े स्वतंत्र पार्टी के उम्मीदवार नारायण दांडेकर ने कानूनी लड़ाई लड़ाई लड़ी और दो साल बाद री वोटिंग में विजयी घोषित होकर सांसद बनाए गए। 1967 में यूपी की तत्कालीन सीएम सुचेता कृपलानी ने यहां जीत हासिल की, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रही सुचेता कृपलानी को यूपी की पहली महिला सीएम होने का गौरव प्राप्त है। कीर्तिवर्धन सिंह के पिता और मनकापुर राजघराने के आनंद सिंह पहली बार कांग्रेस के टिकट पर 1971 में सांसद चुने गए थे। इसके बाद 1980, 1984 व 1989 के बीच उन्होंने जीत की हैट्रिक लगा दी।

नब्बे के दशक से यहां बृजभूषण सिंह ने जमाई धाक

साल 1991 में यहां से बीजेपी के बृजभूषण शरण सिंह ने आनंद सिंह को परास्त कर दिया। 1996 में बृजभूषण शरण सिंह जेल  बंद थे तो उनकी पत्नी केतकी देवी सिंह ने आनंद सिंह को हराकर यहां से बतौर बीजेपी उम्मीदवार जीत दर्ज की। इसके बाद आनंद सिंह ने चुनाव लड़ने से संन्यास ले लिया। उनके बेटे कीर्तिवर्धन सिंह ने विरासत संभाली और 1998 में सपा से सांसद बने। एक साल बाद ही 1999 में बीजेपी से दोबारा बृजभूषण शरण सिंह ने यहां चुनाव जीतकर दबदबा कायम कर दिया। 2004 में इस सीट पर चुनाव के लिए बीजेपी ने अपने विधायक घनश्याम शुक्ल को प्रत्याशी बनाया। पर वोटिंग वाले दिन घनश्याम शुक्ला की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई। इस चुनाव में सपा के कीर्तिवर्धन सिंह जीते। 2009 में कीर्ति वर्धन सिंह सपा छोड़कर बीएसपी  में शामिल होकर चुनाव लड़े पर कांग्रेस  प्रत्याशी बेनी प्रसाद वर्मा से चुनाव हार गए।

बीते दो आम चुनावों मे बीजेपी का डंका बजा

साल 2014 के चुनाव में कीर्तिवर्धन सिंह बीजेपी प्रत्याशी के तौर पर चुनाव लड़े और जीत गए। उनके सामने सपा की नंदिता शुक्ला और बीएसपी के अकबर अहमद डंपी चुनावी मैदान में थे. कीर्तिवर्द्धन ने 1,60,416 वोटों के मार्जिन से चुनाव जीत लिया। 2019 में कीर्तिवर्धन सिंह ने सपा-बीएसपी गठबंधन से चुनाव लड़ रहे सपा के विनोद कुमार उर्फ पंडित सिंह को 1,66,360 वोटों से मात दे दी। कांग्रेस की ओर से चुनाव लड़ी कृष्णा पटेल तीसरे पायदान पर रहीं।

वोटरों की तादाद और जातीय ताना बाना

इस संसदीय सीट पर  18, 43,121 वोटर्स हैं। जिनमें सर्वाधिक  तादाद मुस्लिम वोटरों की है। यहां मुस्लिम वोटर 4.34 लाख हैं, कुर्मी 3.48लाख,  दलित 3.32 लाख और ब्राह्मण 1.5 लाख के करीब हैं। यादव 1.95 लाख हैं। क्षत्रिय एक लाख के करीब हैं जबकि अन्य ओबीसी जातियां 1.20 लाख हैं।

बीते आम चुनाव में बीजेपी ने सभी सीटों पर जीत दर्ज की

इस संसदीय सीट के तहत गोंडा की  गौरा, गोंडा सदर, मनकापुर और महनून विधानसभा हैं, जबकि बलरामपुर की उतरौला सीट शामिल है। 2022 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने  यहां क्लीन स्वीप करते हुए सभी सीटें जीत लीं। उतरौला से बीजेपी के रामप्रताप वर्मा, मेहनौन से विनय द्विवेदी, गोंडा से प्रतीक भूषण सिंह, मनकापुर से रमापति शास्त्री, गौरा से  प्रभात कुमार वर्मा विधायक हैं।

साल 2024 की चुनावी बिसात पर योद्धाओं में जारी है जंग

मौजूदा चुनावी युद्ध के लिए बीजेपी से सिटिंग सांसद कीर्तिवर्धन सिंह पर ही भरोसा किया है। सपा-कांग्रेस गठबंधन से सपा की श्रेया वर्मा हैं। बीएसपी से सौरभ मिश्रा चुनावी ताल ठोक रहे हैं।  कीर्तिवर्धन सिंह का खेमा पांचवी बार सांसद बनाने के लिए संघर्षरत है। वहीं श्रेया वर्मा पूर्व केंद्रीय मंत्री स्वर्गीय बेनी प्रसाद वर्मा की पोती हैं। इस सीट पर अपनी बाबा की हार का बदला लेने के लिए चुनावी मैदान में उतरी हैं। दून स्कूल से पढ़ी हैं, डीयू से इकोनॉमिक्स ऑनर्स हैं। इनके पिता राकेश वर्मा भी विधायक और मंत्री रहे थे। बीएसपी के सौरभ मिश्रा गोंडा सदर के कुंदरूखा के रहने वाले हैं। मेरठ से पढ़ाई की है, यूपीएससी की तैयारी कर चुके हैं। शिक्षक रहे सौरभ के पिता अवध शरण मिश्रा भी पूर्व प्रधानाध्यापक रह चुके हैं। बहरहाल, गोंडा संसदीय सीट से राजघराने के परिपक्व राजनेता कीर्तिवर्धन सिंह के खिलाफ दो युवा चेहरे चुनावी मैदान में होने से लड़ाई त्रिकोणीय बन चुकी है।

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